एक और स्वतंत्रता संग्राम की ओर भारत

Population surge to blame for much of India’s troubles
Population surge to blame for much of India’s troubles
July 31, 2018

एक और स्वतंत्रता संग्राम की ओर भारत

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय दुनिया की जनसंख्या लगभग उतनी ही थी जितनी आज अकेले भारत की है। आज भारत को फिर से एक और स्वतंत्रता संग्राम की आवश्यकता है। बढ़ती आबादी के बोझ से स्वतंत्रता। आजादी की 72 वीं वर्षगांठ के अवसर पर आज मेरे द्वारा भारत की जनसंख्या से जुड़े कुछ तथ्य साधारण भाषा में इस देश के समक्ष रखने का प्रयत्न किया जा रहा है। इस लेख को पढ़ने पर सभी को ज्ञात होगा कि भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है और देश जनसंख्या नियंत्रण के विषय में न सोचे इससे राजनीतिक लोगों का क्या स्वार्थ सिद्ध होता है। इस प्रश्न के साथ कि –

  1. क्या इस बार प्रधानमंत्री लाल किले से 142 करोड़ भारतीयों को संबोधित करेंगे या सदैव की भांति सिर्फ सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ?
  2. क्या प्रधानमंत्री अपने उद्बोधन में जनसंख्या नियंत्रण के विषय को स्थान दे पायेंगें ?
  3. क्या प्रधानमंत्री देश से जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने का वादा कर पायेंगें ?

प्रस्तुत है देश के समक्ष जनसंख्या के विषय में एक विश्लेषण।

भारत की वर्तमान वास्तिविक जनसंख्या – एक विश्लेषण
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की लगभग 65 प्रतिशत से भी अधिक 80 करोड़ की आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। अगर भारत आज ही जनसँख्या को प्रतिस्थापन दर (replacement rate) पर लाने में सफल हो जाता है तब भी आने वाले 35 सालों में कुल 80 करोड़ बच्चों का जन्म होगा। अगर हम इसे सरल तरीके से देखें तो भारत में हर साल लगभग 2 करोड़ 40 लाख बच्चों का जन्म होता है जबकि हर साल लगभग 90 लाख लोगों की मृत्यु होती है। यानी की हर साल जनसँख्या में लगभग 1.5 करोड़ की वृद्धि हो रही है। जोकि निरन्तर बढ़ती ही जायेगी।

जबकि भारत सरकार के द्वारा दिनांक 11 मई 2000 को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भारत के 100 करोड़वें बच्चे ने जन्म लिया था। जिसका नाम आस्था अरोड़ा है। वर्ष 2000 में 100 करोड़ की आबादी 18 वर्षों में बढ़कर सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 136 करोड़ हो चुकी है। इसका मतलब 2 करोड़ की प्रतिवर्ष वृद्धि। जोकि 2011 की जनगणना के आंकड़ों से बिलकुल भी मेल नहीं खाती है।

दूसरे अध्ययन के अनुसार अगर हम भारत में अब तक बने आधार कार्डों का अध्ययन करें तो स्थिति और बिगड़ी हुई प्रतीत होती है। आधार की आधिकारिक वेबसाइट से एकत्रित किये गए आंकड़ों के आधार पर, 30 जून 2018 तक भारत की अनुमानित जनसँख्या 1,33,56,10,250 बतायी गयी है। जिनमें से आज तक कुल 1,22,12,49,465 आधार कार्ड बन चुके हैं। अठारह साल से कम आयु की कुल जनसँख्या 49,12,83,790 में से 34,78,28,374 आधार कार्ड बन चुके हैं। अठारह साल से अधिक आयु की कुल जनसँख्या 84,43,26,760 में से अब तक 84,06,38,755 आधार कार्ड बन चुके हैं। इसका तात्पर्य यह निकलता है की अठारह साल से ज्यादा आयु की अनुमानित जनसँख्या के अब मात्र 36,88,005 लोगों के आधार कार्ड बनने बाकी हैं। आधार की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार कुल अनुमानित जनसँख्या में से 11 प्रतिशत लोगों का आधार कार्ड नहीं बना है। जिसका तात्पर्य यह निकलता है कि भारत में अभी भी 14,69,17,160 लोगों के आधार कार्ड बनने बाकी हैं। जबकि वेबसाईट यह भी कहती है कि सिर्फ 18 साल से कम आयु के बच्चों के ही कुल 14,34,55,416 आधार कार्ड बनाने बाकी हैं। जबकि अनेकों राज्यों में जहां वर्ष 2018 की अनुमानित जनसंख्या कुल 62,56,41,446 थी में से 2,27,56,308 (3.63 प्रतिशत) आधार कार्ड अधिक बन चुके हैं। यदि बची हुई 70,99,69,104 अनुमानित जनसंख्या में भी 3.63 प्रतिशत आधार कार्ड और बनने मान लिया जाये तो 2,57,71,878 आधार कार्ड और बनेंगें। इसका मतलब यदि अभी तक बने कुल आधार कार्ड 1,22,12,49,465, सभी आयु वर्ग के आधार कार्ड बनने से बची जनसंख्या 14,69,17,160, सिर्फ 18 वर्ष से कम आयु के आधार कार्ड बनने से बची जनसंख्या 14,34,55,416, 18 वर्ष से अधिक आयु के आधार कार्ड बनने से बची जनसंख्या 2,56,31,986, अनेकों राज्यों की जहां अभी 100 प्रतिशत आधार कार्ड नहीं बने हैं की बची हुई 70,99,69,104 जनसंख्या में 3.63 प्रतिशत और आधार कार्ड बनने वाली जनसंख्या 2,57,71,878 के आंकड़ों का हम अध्ययन करेंगें तो ज्ञात होता है कि भारत में कम से कम 142 करोड़ लोगों के आधार कार्ड बनाने हैं। अतः इस बात से यह स्पष्ट होता है कि भारत आबादी की दृष्टि में चीन को पीछे छोड़ चुका है, जिसके बारे में हाल ही में चीन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी दावा किया गया है।

हमारे शोध के दौरान हमने यह भी पाया कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कुल विवाहित महिलाओं की संख्या 33,96,21,277 थी, जिनमें से 18,19,74,153 महिलाओं के दो या दो से कम बच्चे थे। जबकि 70 वर्षों से चले आ रहे परिवार नियोजन कार्यक्रमों के बाद तथा वर्ष 1974 से परिवार नियोजन कार्यक्रमों पर करदाताओं के 2.25 लाख करोड़ (वर्तमान मूल्यांकन के अनुसार 20 लाख करोड़ से भी अधिक) से भी अधिक रूपये खर्च करने के बाद भी 15,76,47,124 महिलाओं के दो से ज्यादा बच्चे थे। परिवार नियोजन योजनाओं के 70 वर्षों के प्रचार के बाद भी यदि दो से अधिक बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं की संख्या इतनी अधिक है तो 2011 के बाद आज अगले सात सालों में भारत की जनसँख्या कितनी होगी इसका अनुमान साधारण व्यक्ति भी अवश्य लगा सकता है।

इसलिए हमें भारत की जनसँख्या को नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। बढ़ती जनसँख्या के कारण राष्ट्र सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक दृष्टि से असंतुलित हो रहा है। गरीबी, बेरोजगारी, प्रदूषण, मिलावट, अपराध आदि समस्याएं भी जनसँख्या वृद्धि के कारण दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। भविष्य में कठिन परिस्थिति से बचने के लिए भारत सरकार को जनसँख्या-नियंत्रण की दिशा में शीघ्र ही विशेष कदम उठाने चाहियें।

सिर्फ जागरूकता के सहारे हम इस भयावह स्थिति से मुकाबला नहीं कर सकते। इसके लिए हमें जागरूकता के साथ-साथ कानूनी प्रावधान भी लाना होगा। जनसँख्या-नियंत्रण नीति को प्रभावी बनाने के लिए हमारी तरफ से कुछ सुझाव प्रस्तावित हैं।

अगले 35 वर्षों में भारत की अनुमानित जनसंख्या – एक विश्लेषण
जहां यह स्पष्ट है कि आज भारत की जनसंख्या कम से कम 142 करोड़ है और लगभग 65 प्रतिशत (92 करोड़) जनसंखया 35 वर्ष से कम आयु की है। अगर भारत आज ही जनसँख्या को प्रतिस्थापन दर (replacement rate) पर लाने में सफल हो जाता है तब भी आने वाले 35 सालों में कम से कम 90 करोड़ बच्चों का जन्म होगा। क्योंकि लगातार बढ़ रही स्वास्थ सुविधाओं के कारण मृत्यु दर में कमी आ रही है और औसत आयु में लगातार वृद्धि हो रही है इस कारण से मरने वाले लोगों की जनसंख्या में भी कमी आयेगी। लेकिन फिर भी यदि हम वर्तमान में प्रतिवर्ष 88 लाख मरने वाले लोगों के स्थान पर यह भी मान लें कि आबादी बढ़ने के साथ-साथ भविष्य में औसत 1 करोड़ लोगों की प्रतिवर्ष मृत्यु होगी तब अगले 35 वर्षों में 35 करोड़ लोगों की मृत्यु होगी। मरने वाली जनसंख्या को घटाने पर अगले 35 वर्षों में भारत की जनसंख्या में कम से कम 55 करोड़ की वृद्धि होनी तय है। इससे यह स्पष्ट है कि अगले 35 वर्षों में भारत की जनसंख्या लगभग 200 करोड़ होगी।

जनसंख्या नियत्रण कानून क्यों ?
टैक्सपेयर्स एसोसिएशन ऑफ भारत (टैक्सैब) के प्रयास।

टैक्सपेयर्स एसोसिएशन ऑफ़ भारत (टैक्सैब), सोसाईटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के अंतर्गत पंजीकृत ऐसी संस्था है जिसका उद्देश्य देश के कर-दाताओं और आम नागरिकों के जीवन को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित करने वाली समस्यायों के मूल कारकों की विवेचना कर समाज और राष्ट्र-पटल पर लाना है। विगत दो वर्षो में इस संस्था ने देश में बढती जनसँख्या के कारण उत्त्पन्न हो रहे आर्थिक और सामाजिक संकट से भिन्न-भिन्न सरकारों/जन प्रतिनिधियों के साथ-साथ आम जनमानस को भी अवगत कराया है।

शोध में हमारी संस्था ने पाया है कि देश की अधिकतर समस्याओं का मूल कारण अनियंत्रित गति से बढ़ रही जनसँख्या है। स्वाधीनता के समय जिस देश की जनसँख्या लगभग 36 करोड़ थी, आज वह अनुमानतः बढ़कर लगभग 136 करोड़ से भी अधिक हो गई है। भारत के पास लगभग पूरे विश्व का मात्र 2.4 प्रतिशत भूभाग है, जिसके ऊपर पूरे विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसँख्या निवास करती है। मानक से अत्यधिक जनसँख्या घनत्व के कारण प्राकृतिक रूप से उपलब्ध सीमित संसाधनों का दोहन/क्षय न सिर्फ अप्रत्याशित गति से हो रहा है, बल्कि मांग और आपूर्ति के बीच भी एक गहरी खाई बढ़ती जा रही है।

औद्योगिकीकरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अत्यंत सफलता के पश्चात भी आज समस्त देशवासियों की मूलभूत आवश्यकताओं को सुगम बनाना दुर्लभ हो गया है। कुछ दशकों पूर्व तक अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक धरोहर के कारण विश्व शिरोमणि कहे जाने वाले भारत में आज शुद्ध भोजन, शुद्ध वायु और शुद्ध जल भी प्राप्त करना असंभव हो गया है। अत्यधिक जनसँख्या के कारण राज्य/भारत सरकारों को भी समस्त जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण, रोज़गार आदि उपलब्ध कराने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है।

प्राकृतिक संसाधनों के निरंतर दोहन और अनियोजित उद्योगीकरण के कारण देश की लगभग समस्त नदियों जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र आदि का जल अत्यंत दूषित हो चुका है। बढती जनसँख्या की अग्नि ने अन्य जीव-जंतुओं, जंगलों, पहाड़ों आदि का जीवन भी नष्ट कर दिया है। प्रकृति निरंतर असंतुलित होती जा रही है।

हाल ही में विश्व प्रख्यात पत्रिका “Time” में 4 मई 2017 को प्रकाशित लेख ”Stephen Hawking Says Humans Have 100 Years to Move to Another Planet” में प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्वर्गीय प्रोफेसर स्टीफेन हॉकिंग की चेतावनी से विश्व को आगाह करने की कोशिश की गई। प्रोफेसर हॉकिंग का मानना था कि जिस गति से विश्व की जनसँख्या बढ़ रही है उसके कुप्रभाव भी तीव्र गति से बढ़ते जायेंगें। अगले सौ वर्षो में मनुष्य को रहने के लिए एक अतिरिक्त गृह की आवश्यकता होगी। कारणों को विस्तार से बताते हुए प्रोफेसर हॉकिंग जलवायु परिवर्तन, उपग्रहों का टकराव, महामारी और जनसँख्या वृद्धि आदि को मुख्य कारण बताते हैं। समकालीन, सर्व-स्वीकार्य और सम्मानित वैज्ञानिक प्रोफेसर हॉकिंग की इस बात से हम अपना मुंह नहीं मोड़ सकते।

अगस्त 2017 में सिंगापुर में टाईम्स हायर एज्यूकेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 50 नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों ने अधिक जनसंख्या को सबसे बड़ा खतरा बताया। इसी क्रम में नवम्बर 2018 में विश्व के 20000 वैज्ञानिकों ने अधिक जनसंख्या को विश्व की सबसे बड़ी समस्या बताते हुए एक पत्र पर हस्ताक्षर किये। आपको अवगत कराना है कि वर्ष 1992 में पहली बार जब विश्व की आबादी लगभग 500 करोड़ से अधिक थी तब भी विश्व के 1700 वैज्ञानिकों ने बढ़ती जनसंख्या को सबसे बड़ी चिंता बताते हुए इसे संतुलित करने का सुझाव दिया था।

वर्ष 1968 में फॉरन पॉलिसी एसोसिएशन ने अपनी 15वीं वर्षगांठ के अवसर पर विश्व के हजारों वैज्ञानिको को अगले 50 वर्षों में विश्व की तस्वीर कैसी होगी विषय पर तीन दिवसीय कार्यक्रम में आमंत्रित किया। जहां सभी वैज्ञानिकों के उन तीन दिवसीय अध्ययन और सुझावों को एक पुस्तक ‘‘टुवर्ड द ईयर 2018‘‘ में लिपिबद्ध किया गया। यदि आज हम उस पुस्तक को पढ़ेंगें तो पायेंगें कि उन वैज्ञानिकों की सलाह को न मानकर आज हम 50 वर्षों पुराने जीवन और पर्यावरण को तरस रहे हैं।

इसके उपरान्त भी जब-जब संसद में जनसंख्या नियंत्रण के विषय में प्रश्न पूछा जाता है तो सरकार की ओर से सदैव आई.सी.पी.डी. (इण्टरनेशनल कॉन्फ्रेंस फॉर पॉपुलेशन एण्ड डवलपमेंट) का हवाला देकर कहा जाता है कि भारत उसके नियमों से बंधा है जिस कारण जनसंख्या नियंत्रण कानून नहीं बना सकता परन्तु उसके अघ्ययन करने पर हमने पाया कि यदि हम चाहें तो आई.सी.पी.डी. के बंधनों को मानते हुए भी भारत उपयुक्त कानून बना सकता है।

दलीय राजनीति से हटकर भी कई जागरूक सांसद आज तक जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में संसद में प्राईवेट मेम्बर बिल लाये परन्तु दुख का विषय यह है कि इतने गम्भीर विषय पर एक बार भी संसद में किसी भी बिल पर चर्चा नहीं हुई। अभी हाल ही में 125 सांसदों द्वारा भी इसी संबंध में एक ज्ञापन महामहिम राष्ट्रपति को सौंपा गया है।

आजादी के 70 वर्षों में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर में लगातार वृद्धि होती रही है। परन्तु अनियंत्रित गति से बढ़ रही जनसँख्या का भरण-पोषण करने और राष्ट्र-निर्माण में करदाता का किया गया सहयोग हमेशा कम पड़ा है। जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं, बुद्धिजीवियों तथा सरकारी आंकड़ों के हमारे विश्लेषण से यह बात पूर्णतः स्पष्ट है कि जनसँख्या नियंत्रण हेतु सरकार के अब तक के तरीकों से हम अपने वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के विचार को मूर्तरूप नहीं दे सकते हैं।

उपरोक्त कारणों के प्रकाश में टैक्सपेयर्स एसोसिएशन ऑफ़ भारत इस दिशा में अति शीघ्र कदम उठाये जाने हेतु सरकार का ध्यान आकृष्ट कर रही है। हमारी संस्था जनसँख्या को नियंत्रित करने और राष्ट्र को सुन्दर-सशक्त-सम्पन्न बनाने के लिए राष्ट्र-व्यापी अभियान चला रही है। इस दिशा में देश के सभी नागरिकों का सहयोग अपेक्षित है।

हमारे शोध के अनुसार विश्व में सर्वप्रथम सन 1952 में जनसँख्या नियंत्रण हेतु पहल करने वाला भारत आज विश्व की सर्वाधिक जनसँख्या वाला देश बन चुका है। भारत सरकार ने सन् 1974 से अब तक करदाताओं का लगभग 2.25 लाख करोड़ रुपया जनसँख्या निर्यंत्रण हेतु परिवार नियोजन योजनाओं पर खर्च करा है। जिसका मूल्यांकन अगर हम वर्तमान मूल्य में करें तो यह धनराशी लगभग 20 लाख करोड़ रूपये से भी अधिक बैठती है। अगर जनसँख्या-वृद्धि दर इतनी ज्यादा नहीं होती तो निःसंदेह इस धनराशी का उपयोग राष्ट्र-निर्माण हेतु अन्य कार्यों में किया गया होता। अतः राष्ट्र की प्रगति और करदाताओं के पैसों के समुचित उपयोग हेतु हमें यथाशीघ्र प्रभावी नीतियाँ बनानी होंगी।

इसलिए हमें भारत की जनसँख्या को नियंत्रित करने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। बढ़ती जनसँख्या के कारण राष्ट्र सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक दृष्टि से असंतुलित हो रहा है। गरीबी, बेरोजगारी, प्रदूषण, मिलावट, अपराध आदि समस्याएं भी जनसँख्या वृद्धि के कारण दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। भविष्य में कठिन परिस्थिति से बचने के लिए भारत सरकार को जनसँख्या-नियंत्रण की दिशा में शीघ्र ही विशेष कदम उठाने चाहियें।

इतने विस्तृत विषय को कम शब्दों में समेटना कठिन है परन्तु मेरे द्वारा साधारण शब्दों में इसे समझाने का प्रयास किया गया है। शीघ्र ही इसकी विस्तृत रिपोर्ट देश के समक्ष प्रस्तुत की जायेगी।

मनु गौड़
अध्यक्ष – टैक्सपेयर्स एसोसिएशन ऑफ़ भारत (टैक्सैब)

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